teekhabol

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soni garg


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आज यही सही !!!

Posted On: 30 Nov, 2010  
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Others न्यूज़ बर्थ मेट्रो लाइफ में

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इस TRP के मदारी तो हम ही है !!!!

Posted On: 12 Nov, 2010  
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परफेक्ट होना बोरिंग है !!!!

Posted On: 13 Sep, 2010  
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45 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: soni garg soni garg

शेखर जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार आपने जो बात कही वो हो सकता है सही हो क्योंकि मैंने एक ही लेख में युवा वर्ग पर सब कुछ लिखने की कोशिश की वैसे भी आज युवा वर्ग ने समाज में एक खिचड़ी तो बना ही दी है ! मेरी कोशिश थी कि आज के युवा वर्ग का चित्रांकन कर सकू इस लेख में युवा वर्ग को लेकर जो भी लिखा गया वो आज के युवा वर्ग का आइना ही है लेकिन पूरा नहीं आज युवा वर्ग में कई ऐसे वर्ग बन चुके जिन्हें मैंने अभी इस लेख में छुआ भी नहीं कई ऐसे कडवे सच है जो उजागर नहीं कर पायी उनके बारे अक्सर अखबारों और पत्रिकाओं में पढ़ा और सुना है आपने बताया की आप एक पत्रकार है आप मुझसे कई गुना बेहतर जानते होंगे कि आज के युवाओ की असलियत है क्या बताना तो वही चाहा था लेकिन बजाय ज़ख्मो को कुरेदने के उन पर बस मलहम लगाने की कोशिश की मतलब एक सुधार की मांग की थी ! आज युवा वर्ग की कुछ असलियते जिन्हें में लिख नहीं पायी वो कमेन्ट के माद्यम से कुझे अपने ब्लॉग के कोमेंट पर पढ़ें को मिले अगर आपके पास कुछ समय हो तो आप भी इन पर एक नज़र डाल सकते है इस लिंक पर जा कर ! www.soni-teekhabol.blogspot.com

के द्वारा: soni garg soni garg

के द्वारा:

के द्वारा:

सोनी जी बढ़िया पोस्ट है,, एक विचारक की बात कहूँगा... "" smaal things makes the complement and complement is not a smaal thing" परफेक्शन मानवीय जीवन में संभव नहीं है ,, आपकी दोस्त की समस्या आज लगभग हर उस व्यक्ति की समस्या है जो अन्दर के सामान की ताजगी और गुणवत्ता की जगह बाहर की पैकिंग को महत्वपूर्ण समझता है ..वो डरा रहता है क्योकि जब हम परफेक्शन की बात करते है तो उसमे किसी तरह की कमी को बर्दास्त नहीं कर पाते और इसी वजह से दुःख उठाते है... परफेक्शन की तलाश करने की जगह अगर हम छोटी छोटी बातो पर ध्यान दे तो जीवन में परिपूर्णता आएगी . परफेक्शन तो स्थिर हो जायेगा और जीवन का मजा तो उसके नटखटपन में अस्थिरता में है क्योकि यही तो चैलेन्ज है

के द्वारा:

के द्वारा: shivmani shivmani

के द्वारा: lucknow lucknow

के द्वारा:

वैश्वीकरण के दौर में संस्कृतियाँ अपने आप को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है, इसमें भाषाएँ सम्मिलित हैं. हम भी हिंदी को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. जागरण जंकशन उन्हीं में से एक प्रयास है. हम कहीं लिखते समय या बोलते समय, जैसा की आप के ब्लॉग और मेरी प्रतिक्रिया में भी देखने को मिलाता है, हिंदी या अंग्रेजी का प्रयोग मिश्रित रूप से प्रयोग करते हैं. इसी हिंदी के सन्दर्भ में जागरण जंकशन पर अपनी पहली प्रतिक्रिया लिखते समय मैंने अपनी मनोदशा व्यक्त की है. मैं हिंदी में टाइपिंग नहीं जनता इसीलिए एपिक ब्राउजेर के ( converter software ) का प्रयोग करता हूँ. आप की सभी रचनाएं अच्छी लगी, मेरी प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद...

के द्वारा:

सोनी जी, ये क्या गड़बड़ झाला चल रहा है भाई (सॉरी बहन)? जिसे देखो वो ही आपके नाम की जगह किसी दुसरे का नाम लिख दे रहा है | ओ भाई लोगों इन्ना सोणा नाम 'सोनी' कोई भूलने वाली बात है? देखा मंच से गायब रहने का नतीजा? इन सब को आपका नाम याद है सब आपसे बदला ले रहे हैं गायब होने का| मैं भी लिखू कोई नाम? ओय मन्ने यो सब वड्डा-वड्डा के दिखण लागे सै| हुण ते अवी कोई पाप बी न कियो सै | अब याद आया एक ट्रक के पीछा लिखा था- बुरा जो देखण मैं चला बुरा न मिलया कोए | सारी दुनिया यही कैवे कोई ट्रक वाला न होए | सोनी जी बहुत ही रोचक पोस्ट आपने लिखी आपने मेरे पापा के साथ बिताये दिन याद दिला दिए जब दो साल तक मैं उनका शागिर्द (चेला) था और वो मेरे पापा कम उस्ताद (गुरु) ज्यादा थे और मैं उनसे डीजल (ट्रक इत्यादि) मैकेनिक का काम सीखता था| इस मंच पर ये पोस्ट मेरे दिल के सबसे करीब रहेगी| अच्छी पोस्ट पर बधाई!

के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा:

सोनी जी, बढ़िया लेख के लिए बधाई, ये लेख अपने मैं पूर्ण लगता है, क्योंकि अक्सर जो लेख मैं ऐसे विषयों पर पढता हूँ, उनमें लेखक समस्या तो बता देता है, किन्तु समाधान नहीं बताता, देश की आजादी से लेकर आज के हालात का आपने बखूबी बखान किया, विश्वास कीजिये भारत कभी भी अब दोबारा गुलाम नहीं हो सकता, क्योंकि किसी भी युग मैं भारत मैं वीरों की कमी नहीं है, लेकिन समस्या ये है की इस वक्त वीरता दिखने के लिए दुश्मन नहीं है, बल्कि दुश्मन घर के अन्दर के ही हैं, और अपने ही लोगों के खिलाफ युद्ध करने मैं तो स्वयं अर्जुन को भी दिक्कत हुई थी, तब उन्हें श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश दिया था, और तब जाकर अर्जुन युद्ध कर सके थे! आज हमारे देश के अर्जुनों को जगाने के लिए भी किसी श्रीकृष्ण को अवतार लेना होगा ! रही बात भ्रष्टाचार की तो एक बार मैंने रामदेव बाबाजी के मुह से सुना था की इस देश की ९० प्रतिशत जनता अच्छाई के साथ है, मात्र १० प्रतिशत लोग ही बुराई के साथी है, मगर ये ९० प्रतिशत लोग भी किसी न किसी परिस्तिथिवश इन १० प्रतिशत का साथ दे रहे हैं, किन्तु जिस दिन इन्हें कोई जगाने वाला मिल गया ये १० प्रतिशत लोग मिटटी मैं मिला दिए जायेंगे ! और मेरे विचार मैं देश का एक नेता भी देश की तक़दीर बदल सकता है, सिर्फ उसमें ऐसा करने की इच्छा शक्ति होनी चाहिए, और हमें आशा करनी चाहिए की बहुत जल्द देश को ऐसा नेता मिलेगा !

के द्वारा: allrounder allrounder

के द्वारा: Piyush Piyush

सोनी जी ! आपको एक अच्छे विषय पर एक अच्छे लेख के लिए बधाई ..... जहाँ तक मैंने भी अनुभव किया है, कि जब आज का इंसान एक बुरे दौर (ऐसा समय जब वो परपीडित होता है ) से उबर जाता है | जीवन के संघर्षमय दिनों के कष्ट झेल चुका होता है | और तनिक अच्छी स्तिथि में होता है | तब वही (परपीडित) परपीड़क बन जाता है | उदहारण के लिए एक आप ने दे ही दिया है, इनके अतिरिक्त भी वर्त्तमान समाज ऐसे दृष्टान्तों से भरा पड़ा है ......... लोग आजकल स्वार्थ के चरम से परे और निकृष्टता के निम्मनतम स्तर से नीचे जा चुके है | ऐसे स्तिथि में लोगों का वैचारिक उत्त्थान परम आवश्यक हो गया है | और इसके लिए व्यतिगत उत्थान कि क्रांति का आह्वाहन होना चाहिए |

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey Shailesh Kumar Pandey

के द्वारा:

मेरे इस लेख को पसंद करने के लिए आप सभी का धन्यवाद ............ इस लेख में मुझसे एक भूल हुई जिसका सुधार ज़रूरी है दरअसल चौथे नंबर पर दी गई सर्वे की रिपोर्ट में मैंने कहा की ये विदेशी टूरिस्ट्स पर करवाया गया था लेकिन आज ही जब दुबारा इसके आंकड़े देखे तब ज्ञात हुआ की ये सर्वे विदेशी टूरिस्ट्स पर नहीं बल्कि दिल्ली की ही महिलाऔ पर करवाया गया था और ये सर्वे महिला व् बाल विकास विभाग, एनजीओ जागोरी, यूएन हेबिटेट और यूनाइटेड नेशंस डेवलेपमेंट फंड फॉर वुमेन द्वारा करवाया गया था ! सर्वे विदेशी टूरिस्ट्स पर भी करवाया गया था लेकिन अभी उसके आंकड़े मुझे ज्ञात नहीं है, ज्ञात होते ही बताने की कोशिश करुँगी ! धन्यवाद !

के द्वारा:

बड़े सरल और सही तरीके की बात कही है अदिति जी ने. दोनों पक्ष (माता-पिता और बच्चे) जितना हो सके नजदीकी सम्बन्ध बनाये और एक दुसरे को समझने की कोशिश करें. सोनी जी भी 'समाज और माता-पिता' को 'दुश्मन ज़माना' के रूप में प्रस्तुत न करें | 'इज्जत' पर सवाल न उठाएं इज्जत का मर्म समझें. जितने हलके तरीके से आपने सम्मान की बात कही वो इतनी हलकी नहीं. आपके लिए एक बार फिर लिखता हूँ- तू रस्मे-मोहब्बत कभी समझा ही नहीं वर्ना, पाबंदिये-इंसां ही आजादिये-इंसां है | और जिस नई सोच और व्यवस्था की आप बात कर रहे हैं उसे मैं बयान करता हूँ- 'इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया ? सेक्स की रंगीनियाँ या गोलियाँ सल्फ़ास की !' जिसे लोग मोहब्बत कह रहे हैं उसकी हकीकत का बयान कुछ ऐसा है- 'सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास वो कैसे। मोहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है।।' प्रतिक्रिया बुरी लगे तो क्षमा कीजियेगा | क्या करूँ, शुद्ध हिन्दुस्तानी खून है सम्मान की बात होती है तो गुलामी याद आ जाती है, कभी जौहर, तो कभी झांसी की रानी याद आ जाती है. जब कोई नारी इज्ज़त की बात करती है तो मेवाड़ की कृष्णा कुमारी याद आ जाती है | काश कि आप एक स्त्री ना होती तो कुछ-एक सवाल मैं भी आप से पूछता. नहीं पूछ रहा हूँ इसी का नाम सम्मान है, आप आज नहीं तो कल समझ जायेंगी, आपके अन्दर गुबार चाहे जितना हो संशय और पूर्वाग्रह चाहे जितने हों लेकिन आप एक स्त्री हैं तो एक दिन आपके अंतर्मन में छिपी एक माँ एक दिन आपको जवाब देगी. जिस दिन आपका बेटा या बेटी आपसे कहेगा 'माँ क्यों चिंता करती है, मेरी रगों में बहता तेरा खून तेरे सम्मान पर आंच नहीं आने देगा. जब दुनिया दिल दुखाती है तो माँ कहती है- हमें हरीफ़ों की तादाद क्यों बताते हो हमारे साथ भी बेटा जवान रहता है ! आज जो बेटियों को करना है वो ये कि इतना विश्वास जगाओ अपने माता-पिता में कि वो कहें- हमें हरीफ़ों की तादाद क्यों बताते हो हमारे साथ भी बेटी जवान रहती है ! तल्ख़ टिप्पड़ी के लिए एक बार फिर क्षमा-याचना.

के द्वारा:

आजकल इस तरह की घटनाएँ आम हो गई हैं और एक जागरूक इन्सान को सोचने के लिए मजबूर करती है कि क्या इंसान का खून पानी हो गया है....आज कल के माहौल को देख कर कहा जा सकता है कि इसके लिए दोनों ही पक्ष बराबर के गुनाहगार हैं..... हल बस यहीं है कि माँ-बाप अपने बेटे-बेटियों को समझे और कोई भी फैसला लेने से पहले एक बार उनके द्वारा चुने साथी से मिल तो ले.........क्या पता आप जैसा चाहते हो, वो वैसे ही हो.....लडके-लड़कियां भी घर से भागने या भाग कर शादी करने का कदम उठाने के बजाय अपने परिवार वालों को अपने साथी से मिलवाए और उन्हें मनाने कि कोशिश करें.....पहले विरोध जरुर होगा...पर अगर आप अपनी बात पर अटल रहें तो धीरे धीरे उनका दिल जरुर पिघलेगा...

के द्वारा: aditi kailash aditi kailash

सोनी जी अच्छा सब्जेक्ट चुना है आपने, इस समस्या से उबरने के लिए मैं एक उपाए बताता हूँ. इस देश के हर माँ-बाप को अपने और अपने बच्चो को जानना और समझना होगा. अपने बच्चो पर भरोसा करना होगा. बच्चा अपने परिवार और समाज का आइना होता है. उन्हें ये समझना होगा की अगर ये बच्चा ऐसा कर रहा है तो इसमें उसकी कोई गलती नहीं है. ये उसने अपने परिवार और समाज से सीखा है. जो आपने किया नहीं, जो आप अपने अंदर दबा कर रख रखा है, वो उनके बच्चो ने कर दिखाया है. और वैसे भी बिना शादी के कोई माँ-बाप अपने बच्चो को रख नहीं सकते. अगर कोई अपनी मर्ज़ी से अपना साथी चुन लिया है तो इसमें तो और अच्छी बात होनी चाहिए की उनकी परेशानी दूर हो गयी. अगर बच्चो द्वारा चुने हुए साथी पर माँ-बाप को एतराज हो तो उस माँ-बाप को बच्चो द्वारा चुने हुए साथी से मिलना चाहिए. हर माँ-बाप को अपने बच्चो का साथ देना चाहिए. वो इस देश के आने वाले कल का भविष्य है. अगर माँ-बाप को अपने बच्चो का साथ देने में इज्ज़त आड़े आने वाला हो तो उन्हें बच्चा पैदा ही नहीं करना चाहिए. एक दिन पैदा किया कुत्ते की तरह पट्टा बाँध कर रखा और अगर वो थोडा सा अपने हिसाब से चलना चाहे तो एक दिन आप उसका खून कर देते है. जरा ध्यान से सोचिये धन्यवाद

के द्वारा:

सोनी जी,आपकी बात से असहमत होने का कोई कारण नहीं है,सोचना ये है कि तथाकथित HONOUR KILLING के मूल में क्या है और यह स्थिति कैसे बदली जा सकती है?क्या समाज और उसकी रुढिवादिता इसके लिए जिम्मेदार नहीं है?समाज की संकीर्ण सोच आज भी गाँव,कस्बों में उस परिवार का जीना मुश्किल कर देते हैं जिसकी लड़की प्रतिलोम विवाह या विजातीय विवाह करती है,संकीर्ण सामाजिक सोच ही कन्या भ्रूण हत्या के लिए भी जिम्मेदार है,या तो वों परिवार इतना बोल्ड हो कि वो ताने देने वालों को करारा और तर्कपूर्ण जवाब दे सके तभी वो सामाजिक ताड़ना का मुकाबला कर सकता है,मैं मानती हूँ सामाजिक भय तथाकथित HONOUR KILLING के मूल में है,हालाँकि खुद की मानसिकता भी कई बार रुढ़िवादी होती है,जो सामाजिक मानसिकता से ही प्रभावित होती है

के द्वारा:

सोनीजी, समाज की दिवालिया सोच को उजागकर करती एक अच्छी रचना। बधाई। मैं आपकी बात से बिलकुल सहमत हूं। दरअसल माता-पिता कई बार समाज के दबाव के कारण अपने बच्चों की खुशियों की बलि चढ़ा देते हैं। खोखली इज्जत के आगे वे अपनी खून का ही खून कर देते हैं। ज्यादातर लड़कियां माता-पिताओं की इस सोच का ज्यादा शिकार होती हैं क्योंकि लड़कियों को घर की इज्जत समझा जाता है और अगर लड़कियां अपने पसंद से युवक के साथ प्यार करें या शादी करें तो उनके खराब चरित्र का समझा जाता है। इस घटिया और दकियानूसी सोच से बाहर आना पड़ेगा। यह एक सामाजिक विकृति है। माता-पिता अपने बच्चे के लिए उपयुक्त जीवनसाथी चुनना चाहते हैं जो उन्हें खुश रखे लेकिन जब बच्चे अपना साथी चुन लेते हैं तो उन्हें लगता है कि वह शख्स गलत होगा। इस सोच से बाहर होना होगा, हो सकता है जिस इंसान को बच्चों ने अपने लिए चुना हो उसमें वो सब खूबी हो जिसे वो देखना चाहते थे और वो उनके बच्चों को खुश रख सके। हां कुछ लोग होते हैं जो प्यार के नाम पर धोखा देते हैं लेकिन सब इस तरह के नहीं होते। बहुत से लोग सच्चा प्यार भी करते हैं और उसे निभाते भी हैं।

के द्वारा: sumityadav sumityadav

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के द्वारा:

अभी कितना जीना हैं ये तो आपके विचारों पर निर्भर करता हैं. अगर आप दुनिया मैं खुश हैं तो आप जादा जीना चाहते हैं अगर नहीं तो कम. सीधी सी बात है. उसमे बिचारे रामदेव बाबा को क्यूँ लेके आये. वोह तो सबके अछे के लिए कह रहे हैं. अभी आपको पहले आपने विचार सकारात्मक करने होंगे. आपकी पहले चाह ये होनी चाही ये की सभी लोग खुश रहे सेहत मंद रहे तोह फिर जीने की इच्छा बढ़ जाती हैं. फिर बाबा रामदो की सलाह याद आती हैं. बराबर न. तो आजसे सभी लोग सिर्फ अच्छा सोचे अच्छी सेहत के बारे मैं सोचे अच्छे विचार रखे तो सब कुछ अच्छा हो जायेंगा. वातावरण भी ठीक हो जायेंगा तनाव भी निकल जायेंगा तो जीने की आयु भी बढ़ जायेंगी. खुश सोचो खुश रहो अची सेहत के बारेमें सोचो अछि सेहत मिलेंगी. नकारात्मक देखोंगे तो वाही मिलेंगा. सोच आपकी जिंदगी आपकी.

के द्वारा:

मुज़े नहीं लगता के सिर्फ इतनी ही बात काफी हैं. आपका कहना बराबर हैं पर भारत मैं खासकर शहरोमें एक और खतरा बढ़ रहा हैं शायद वोह गांवमें भी हो सकता हैं. वोह हैं बिल्डर'स का खतरा. जितने आसानी से ये लोग ज़मीन खरीद लेते हैं और Towers खड़े करदे हैं तो ग्लोबल वार्मिंग तो बढ़ने वाली ही हैं न. फिर चाहे आप उसे A.C. , gizar कुछ भी लगादो. जहा पे २० या २५ घर होते थे वही पे आज ४०० से ४५० ब्लोच्क्स हो गए हैं. न जाने उसमे कितने AC लगे हो. लेकिन AC को देखने के बजे हम ये देखना ही नहीं चाहते की पेड़ कहा पे बाके हैं या नहीं. जंगले तो बहोत दूर की बात हैं. न तो पेड़ बच रहें हैं और न ही जंगल. तो पर्यावरण को आधार कहा से मिलेंगा. समुंदर के पास देखो तो मंग्रोवेस को काट रहे हैं क्यूँ तो हमें समुंदर के करीब Bunglow चाहिए. हमारी सरकार टीवी पे तो पर्यावरण के बड़े बड़े इश्तिहार दिखाती हैं अगर ऐसा हैं तो इन Builder Lobby को पेड़ काट के या जंगले काटके आगे बढ़ने की इज़ाज़त क्यूँ देती हैं. क्या ग्लोबल वार्मिंग के लिए सरकार का जान्बुज्कर आँखे बंद करना सही हैं. जहा पे खेती होती हैं वह पे भी बड़ी बड़ी Buildings & Complex दिखने लगेंगे. फिर हम शक्कर की तरह पालक , नीम्बू जिसे चीजे भी IMPORT के नाम पर मांगने लगेंगे. न खेती न पेड़ न जंगल न इंसान हम तो सिर्फ इमारते ही देखेंगे. वैसे अलग कुछ कहने की जरूरत नहीं हैं की Builders को आशीर्वाद कौन दे रहा हैं.

के द्वारा:

के द्वारा:

सोनी जी, आज आपके इस लेख पर अनायास ही नज़र पड़ी, पढते ही मुझे लगा कि मेरा सोचना बिलकुल ठीक था. आप निश्चय ही विचारों के अविरल प्रवाह (Stream of Consciousness) की लेखिका हैं. आपके इस लेख से मैं १००% इत्तेफ़ाक रखता हूँ. आपका यह कथन- (पहले ही हमारा समाज पाश्चात्य संस्कृति की अंधी दौड़ में भागते हुए अपना अस्तित्व खोता जा रहा है, तो क्या अब प्रेमेरिटल सेक्स को जायज़ ठहरा दिया जाये और इसे हम अपनी खुली विचारधारा मानते हुए इस पर गर्व करे ! ये सही है की समय के साथ सबको बदलना चाहिए लेकिन ये बदलाव क्या हमारे समाज के लिए घातक नहीं है !) गहन चिंतनीय, समाज को सजग करने वाला और हमारे साँस्कृतिक गर्व को सतत कायम रखने का अहसास समेटे हुए है. सच कहा है आपने कि बदलाव जब सही दिशा में हों तभी बेहतर होते हैं. कुछ चीज़े न ही बदलें तो अच्छा होता है. सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी कहीं न कहीं बेहतर सोच कि कमी कि ओर इशारा करता है. और हमे यह सोचने पर मजबूर करता है कि मानवीय अदालत सिर्फ फैसलों कि अदालत हैं न्याय इनमें कभी-कभी होने वाली घटनाएँ मात्र हैं जो दुर्लभतम ही दृष्टिगत होती हैं. इस प्रशंसनीय लेख के लिए आपको बधाई ! और समाज को खासकर नवयुवक एवं प्रौढ़ वर्ग को जगाने के लिए आपका धन्यवाद !

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सोनी जी, आपका लेख पढकर बड़ा आश्चर्य हुआ थोडा अच्छा भी लगा स्पष्ट कहूँ तो आपका लेख पूर्वाग्रह से ग्रसित नज़र आया . आपने रामायण से ले के निरुपमा शर्मा तक कि कहानी सुना डाली पहले अच्छा लगा प्रतीत हुआ जैसे कोई नई बात कहने वाली हैं फिर अचानक आप नारी मुक्ति आंदोलन पर उतर आई . अगर आप नारी शोषण कि बात कह रही हैं तो आप को निरुपमा कि बात नहीं करनी थी. मैं आप से एक सवाल पूछता हूँ ईमानदारी से जवाब दीजियेगा - क्या आप अपने हाथों अपनी बच्ची कि हत्या कर पाएंगी ? रुकिए  मैं आपसे इसका जवाब नहीं मांगू मुझे आप का जवाब पता है अब आप बताओ क्या आप निरुपमा कि माँ को कातिल कहेंगी . आपका जवाब हाँ हो या न लेकिन आप अब ऐसी स्थिति कि कल्पना करो जहाँ आपने अपनी बच्ची को लड़कों कि तरह पला पोसा बड़ा किया पत्रकारिता करने दिल्ली भेज दिया और एक दिन आपकी कुंवारी लड़की अपने पेट में गर्भ लेकर आप के पास अब आप पर क्या बीतेगी आप उसे सेक्स में सावधानी का पाठ पढायेंगी उसकी आरती उतारेंगी या उसका विवाह एक ऐसे आदमी से कर देंगी जिसे आपकी लड़की को गर्भवती करने का शौक तो था लेकिन विवाह से पहले क्या आप इस हवस की राम और कृष्ण का सीता और राधा के प्यार से तुलना करेंगी  कृष्ण की रास लीला पढ़ी और बस अधिकार मिल गया सबको रास रचाने का राधा के चरित्र को समझा भी है कि उदाहरण ही देने लगे - तुम करो तो रास लील हम करे तो पाप. भारत का इतिहास भी पढ़ लो जौहर हमारा गौरव था मर्द अगर रणभूमि में क़त्ल होने का साहस रखते थे तो नारियाँ अपनी आन को कुर्बान होने का दम भारती थीं. प्रेम मीरा और राधा कि तरह होता है. जब सीता ने अपने राम कि आन पर क़ुरबानी देकर अपने प्यार को खरा साबित किया तो आप और हम कौन होते हैं उनके अपने प्रेम पर कुर्बान होने पर तुच्छ अधिकारों का कलंक लगाने वाले. आज अगर सीता कि आत्मा देखती गी तो उसे कष्ट होता होगा ये सुनकर जो उसके राम पर पुरुषवादी होने का कलंक लगाते हैं . प्रेम पर व्यंग करने और हवस कि तरफदारी करने से पहले किसी से सच्चा प्यार करके देखो  शारीरिक सम्बन्ध बनाना तो दूर किसी कि ऊँगली भी प्यार पे उठे तो जान निकल जाती है . प्यार मर्यादा भूलता नहीं है मर्यादा पर कुर्बान होना सिखाता है समाज से अधिकार नहीं मांगता समाज को त्याग करना सिखाता है.  कृष्ण पर ऊँगली उठाने वाले एक पल के लिए कृष्ण बनो और देखो - रोक सकते हो अपने आँसू , कर सकते हो उतना त्याग, सह सकते हो विरह. नही. सामाजिक सन्दर्भ में कुछ कहने से पहले सोचो समाज से मांगो नहीं समाज को दो समाज को स्त्री पुरुष में तोडो मत इन्हें जोड़ो मर्यादा में जोड़ो पवित्र समाज इंसान पैदा करेगा अपवित्र समाज सिर्फ नर-पशु क्या चाहते हो माँ बाप कि गलती ये है कि उन्होंने आप पर भरोसा किया. आपको उच्च शिक्षा दी. गर्व से सर उठा के चलने को एक कुलीन खानदान दिया और तुम उसे अपमानित करके उनकी आँखों को आंसुओं से भर दे रहे हो. उनका सर शर्म से झुका दे रहे हो. अपने ही साक्षात भगवान को शर्मसार कर रहे हो. मैं तो कहता हूँ जिसने जन्म दिया है उसे मारने का भी पूरा हक है मै अपनी माता को अपना शीश देता हूँ इसके लिए मुझे किसी क़ानून किसी सरकार और किसी उदारवादी चिन्तक कि जरूरत नहीं . मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसी विरासत का उत्तराधिकारी हूँ जिसने जरूरत पड़ने पर अपनी भारत माता को अपना शीश सौपा था अब जरूरत पड़ने पर अपनी जन्मदाती मान को सौंपता हूँ मेरी इच्छा है कि मेरे बच्चों को मेरी माँ जैसी माँ मिले जो भारतीय समाज के लिए अपने पुत्र कि गर्दन उतर सके ऐसी उदारवादी माँ न मिले जो चरित्रहीनता को बढ़ावा दे कर भारतीय नारी को सिर्फ उपभोग कि वस्तु बना दे . सोनी जी आप अच्छा लिखती हैं , इस कौशल का प्रयोग भारत को एक अच्छी दिशा देने के लिए करे लड़कियों को माता-पिता पर विश्वास करना सिखाएं विश्वास टूट जायेगा तो ये माता-पिता टूट जायेंगे. आप शायद अच्छे और धनी परिवार से हैं इसलिए आप माता पिता का प्यार समझ नहीं पाई कितनी हसरतों से हमें अपना खून पिला पिला के पालते हैं ये. अच्छे कपडे नहीं पहनते अच्छा खाना नहीं खाते सारी इच्छाएं दिल में रखे हमारा मुँह देख के जीते हैं हम इन्ही को धोखा दे दे ये कहाँ का न्याय है आप जो ऊँची और नीची जाति कि बात बार बार करती हैं वो गलत है कोई जीती ऊँची नीची नहीं होती बात ऊँची नीची होती है अपने माँ बाप कि बात ऊँची रखने में क्या हर्ज है. वो तो जीते जागते भगवान हैं उनका तो सितम भी हमारे लिए खुश्किश्मती है . 

के द्वारा: chaatak chaatak

निरुपमा ने आत्महत्या की है या उसकी हत्या हुई है ये मैं नहीं जानती पर हाँ इतना जरुर है की जो भी हुआ है वो एक ओनर के लिए ही हुआ है क्योकि वो गर्भवती थी ! इसलिए इसे ओनर किलिंग कहना गलत नहीं है ! दूसरी बात "लेकिन क्या इसके बाद निरुपमा की हत्या नहीं होगी ?" ये अपने आप में एक प्रश्न है की अगर उसकी हत्या हुई है और उसे इन्साफ मिल भी जाता है तो क्या उसको मिलने वाला इन्साफ भविष्य में लोगो के लिए सबक बन सकेगा ! अपने इसी प्रश्न के साथ मैंने मनोज और बबली के केस को भी सिर्फ इसलिए जोड़ा की कानून का फैसला भी लोगो की सोच नहीं बदल सका तो क्या निरुपमा को मिलने वाला इन्साफ ओनर किलिंग को रोक पायेगा और अगर निरुपमा ने आत्महत्या भी की है तो ये भी किसी ओनर के लिए ही की गई होगी क्योकि अगर सारी परिस्थतिया उसके पक्ष में होती तो वो तो क्या कोई भी आत्महत्या जैसा बड़ा कदम नही उठाएगा ! इसलिए यहाँ भी मामला एक ओनर का ही होता है और हो सकता है की मैं पूरी तरह से गलत होऊ ! लेकिन फिर भी किसी भी नज़रिए से ये मामला ओनर से हट कर नहीं देखा जा सकता ! इस लेख पर अन्य प्रतिक्रिया पड़ने के लिए यहाँ क्लीक करें ! www.soni-teekhabol.blogspot.com

के द्वारा:

१. लेकिन अक्सर ये देखने में आता है की इस तरह की ओनर किलिंग का शिकार ज्यादातर महिलाए ही होती आई है ! इसकी गहराई में उतर कर जितना इसके बारे में जानने की कोशिश की ये खाई उतनी ही गहरी होती चली गई ! कितनी ही निरुपमाये आज अतीत में दफन हो चुकी है ! उपरोक्त को पढने पर यही लगेगा कि निरुपमा वाकई आनर किलिंग का शिकार हो गयी, निष्कर्ष दे दिया आपने. २. आपने लिखा है कि "लेकिन क्या इसके बाद किसी और निरुपमा की हत्या नहीं होगी." इसे पढने से क्या सन्देश जा रहा है? यानी निरुपमा की ह्त्या ही की गयी है. अभी मुजफ्फरनगर की एक घटना मैं बयां कर रहा हूँ जहाँ घर से अपने प्रेमी के साथ भाग कर जाने वाली लडकी और लड़के की ह्त्या की खबर मीडिया में खूब उछली. यहाँ तककि उसके भी को पुलिस ने मार-मार कर ये बयां दिलवा दिया कि उसी ने दोनों की ह्त्या की थी. किन्तु जन प्रेमी जोड़े स्वयं ही सामने आ गए तो फिर वही मीडिया खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे वाली हालत में आ गया. ये मैं सिर्फ इसलिए कह रहा हूँ कि कोई भी व्यक्ति पूरी परिस्थिति को पहले पूरा समझे फिर कुछ राय दे क्योंकि हो सकता है कि हम जिसके पक्ष में बोल रहे हैं पता चले कि उसने माहौल का लाभ उठा कर लोगों की भावनाओं को अपने वश में कर लिया हो

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के द्वारा: shibbuaryamathura shibbuaryamathura

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सोनी ये बात सही है की ताली एक हाथ से नहीं बजती एक गलत बात को गलत बात से justify नहीं किया जा सकता है ..आपका ये लेख बहुत हद तक एक ऐसी गलत और बेहूदगी भरी संस्कृति की ओर इशारा करता है जो आज की युवा पीढ़ी में एक परंपरा बनती जा रही है..... जिसका मोटो है """ सब चलता है सब जायज है ""..अश्लील भद्दे मजाक लडको में आम थे पर अब लडकिय भी खुले आम इसमें शामिल हो रही है ...............सरकार पहनने वाले कपड़ो के लिए कोई आचार संहिता नहीं बना सकती ये तो हमारे सामाजिक जिम्मेदारी का प्रश्न है ५० % virjin लिखी टी शर्ट मैंने एक लड़की को पहने देखा ..एक pco पे जहा वो recharge कूपन ले रही थी उसका सेल सामने रखा था और उसपे लगा वाल पेपर बेहद भद्दा था.. जिसे आम तौर पर लड़के भी नहीं लगाते कही किसी के सामने न पड़ जाये.दूकानदार भी देख कर हस पड़ा .. पर इसमें दोष उसका नहीं है दोषी हमारी वह पारिवारिक व्यवस्था है जो इन चीजो पर ध्यान नहीं देती .. न माँ बाप बच्चो की जिम्मेदारी उठाना चाहते है न बच्चे अपनी ....बच्चे आजादी के नाम पर मनमानी और अराजक व्यवहार करते है . आपकी निरीक्षण क्षमता बेहतरीन है ... पर इसका इलाज सामाजिक जागरूकता ही है क्योकि बचे इसके लिए बहुत दोषी नहीं है ..

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

समता जी की बात से मै सहमत हु कोई भी संस्था हो उसे अराजक होने का अधिकार नहीं है ... समता जी गाँवों में पंचायते एक तरह से कठोर सामाजिक नियंत्रण का काम करती है .. ऐसे कठोर और अमानवीय निर्णय वाले मामले बहुत कम ही है लेकिन उन्हें मीडिया इतना ज्यादा प्रचारित करती है की हम ये समझने लगते है की हर जगह ऐसा ही है ... पर वास्तविकता ये नहीं है .. बहुत वैज्ञानिक ढंग से हमारा सामाजिक ताना बना हजारो सालो से काम करता रहा है ... {इन्ब्रीडिंग} के biological दुष्परिणाम.है और इनकी .. वजह से ही इसपर नियंत्रण लगाया जाता है लेकिन इसपर मृतुदंड देना तो कही से भी उचित नहीं है और न ही पंचायतो को ये अधिकार दिया जाना चाहिए... और हा मीडिया को ऐसे पहलु भी उठाने चाहिए जो पंचायतो के सकारात्मक कार्यो को दिखाती है .. .. गाँवों में स्थिति बेहद ख़राब हो रही है क्योकि गाँव के बहुत कम उम्र के युवा बाजारी आकर्षण में फस कर बेहद कम उम्र में भटक रहे है .... ऐसे में गाँवों में ऐसी सामाजिक नियंत्रण रखने वाली संस्थाओ का होना बहुत जरुरी है .ये सरकार और कानून का विषय नहीं है बल्कि हमारी सामाजिक व्यवस्था का विषय है ....क्योकि शहरो की तरह अगर ग्रामीण समाज भी भोग विलास. की अंधी दुनिया में फस कर मानसिक अवसाद की स्थिति में पहुच गया तो उसके दूरगामी दुष्परिणाम होंगे...

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सोनीजी,सामाजिक व्यवस्था बनाने और उसे बनाये रखने के लिए इस संस्था के ऐतिहासिक महत्व को नकारा नहीं जा सकता लेकिन बदलते समय के साथ खाप प्रधानो को अपने तरीकों एवं दृष्टि को उदार बनाना चाहिए,एक गोत्र मैं शादी करने {इन्ब्रीडिंग} के biological दुष्परिणाम के मध्य-नज़र ही इसे सामाजिक रूप से रोकने की कोशिश की गयी,लेकिन यह एक सामाजिक चेतना का विषय है,और जो भी एक गोत्र मैं शादी कर लेते हैं तो फिर उन्हें मृत्युदंड देने का अधिकार खापों का नहीं है,व्यक्ति की सामाजिक जिम्मेदारिया भी हैं जिन्हें उसे निभाना चाहिए लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता का भी सम्मान सगोत्रीय शादी, जो की बहुत कम ही होती हैं ,करने पर खापों द्वारा किया जाना चाहिए,वैसे यह कानूनी से ज्यादा सामाजिक चेतना का विषय है लेकिन इन तौर-तरीकों से खाप अपनी उपियोगिता जल्द ही खो देंगी,

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सोनी जी ,आपका लेख बहुत अच्छा लगा आपने जिस तरह दक्ष के यज्ञ से लेकर आधुनिक काल तक की पंचायत व्यवस्था को दिखाया है वह आपकी लेखन क्षमता को दर्शाता है. असल में हमारी सामाजिक व्यवस्था बहुत ही जटिल रही है इसकी कुछ खामिया है तो कई महत्वपूर्ण लाभ भी है .. अक्सर ऐसे निंदनीय मुद्दे मीडिया में आते है जिन्हें सुनकर पंचायतो के प्रति हमारा खून खौल उठता है .. मै किसी भी तरह से आपसे असहमत नहीं हु न तो मै आपके लेख का विरोध कर रहा हु .मेरा उद्देश्य मात्र ये है की आपके लेख में कुछ जोडू ......................... एक प्रश्न ये उठता है की आखिर क्यों केवल प्रेम और अवैध संबंधो ,सम्बन्धी मामलो में ही पंचायते ऐसा कठोर निर्णय लेलेती है और क्यों हम पंचायतो की एक इसी बात को उठा कर सारी पंचायतो को कटघरे में खड़ा कर उनके औचित्य पर ही प्रश्न चिन्ह लगा देते है ?जबकि कुशीनगर की हाल ही की एक घटना बताना चाहता हु .कुछ दिनों पहले यहाँ खबर आई की पंचायत ने एक प्रेमी प्रेमिका की पिटाई कर के उन्हें गाव से बाहर निकाल दिया ... सभी को बेहद गुस्सा आया पंचायत के इस फैसले पर और ये बेशक गलत फैसला था... फिर कुछ चीजो पर मैंने गौर किया क्योकि वाकया मेरे गाव के पास का ही था... पंचायत के लोगो पर पुलिस का भी दबाव पड़ा....पता चला की लड़के की उम्र 15 -16 वर्ष थी और महिला 30 -32 वर्ष की विवाहिता थी.और एक बच्चे की माँ थी.. हर तरफ पंचायत की ही आलोचना हो रही थी.... अब इस घटना पर जरा ध्यान दे.... लड़का नाबालिग है और किसी भी तरह से जिम्मेदार नहीं है ..लड़की को सिर्फ प्रेम दिखा उसे वास्तविकता ,व्यावहारिकता और औचित्य कुछ भी नहीं दिखा ...और वे घर से भाग गए .. अब बताइए की क्या पंचायत इसे स्वीकृति दे देती? और अगर दे देती तो कौन सा उदाहरण बच्चो के सामने रखती ?.व्यक्तिगत आजादी, मानवाधिकार का समर्थक मै भी हु पर ये एक सीमा में ही होने चाहिए व्यक्तिगत आजादी इतनी ज्यादा न हो की हम अराजक हो जाये और सारी मन मर्यादा समाज को भूलकर केवल अपने भौतिक सुख में लीं हो जाये अधिकांश उदाहरण ऐसे ही आते है.. अपरिपक्व युवाओ के ..सोनी , हमारे देश में पंचायत एक बहुत महत्वपूर्ण व्यवस्था रही है यह सदा से ग्रामीण जीवन का आधार रही है इसका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण प्रभाव ये है की हमारे गाव की जीवन शैली आज भी बहुत हद तक अनुशासन में है संयमित है .. यद्यपि आज गाँवों में बाजारवाद की अनैतिक संस्कृति जा चुकी है और इसके शिकार किशोर हो रहे है उनके व्यवहार गाँवों में भी बेहद अशालीन और अश्लील होते जा रहे है क्योकि वे अनजान है इस सुनहरे भोगवादी प्रदर्शन से और वे शहरी जीवन का अँधा अनुकरण कर रहे है ..ऐसे में उनके बहकने और भटकाव की ज्यादा गुंजाईश रहती है. अधिकांश मामलो में ये देखा जा रह अहै की नाबालिग और गैरजिम्मेदार बच्चे ऐसी हरकते सार्वजनिक रूप में करते हुए मिल रहे है की जो हमारे ग्रामीण अनुशासित परिवेश के लिए है और खतरनाक भी है .एक सवाल ये उठता है की पंचायते निर्णय करने वाली कौन होती है ये काम तो पुलिस का है ..... पर जरा सोचिये पंचायतो की वजह से प्राचीन काल से ही ग्रामीण व्यवस्था आज भी मजबूती से बनी हुई है . एक एक गाँव में हजारो मामले ऐसे होते है जिन्हें पंचायते वही सुलझा देती है और उन्हें कोर्ट ,पुलिस की महँगी झेलाऊ और उत्पीड़क प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता . और आप को पता ही होगा हमारी न्याय व्यवस्था की रफ़्तार लाखो केस पेंडिंग है अगर पंचायते आज की तारीख में हटा दी जाये तो न्याय व्यवस्था बोझ से टूट जाएगी और आम आदमी को हुई परेशानी अलग....कितने लाख गाँव भारत में है जिन्हें आज भी पंचायते बांधे हुए है ..और कुछ गिने चुने किस्सों को (यद्यपि वे अमानवीय है ) ही हम खबरों में पाते है और उनके आधार पर पंचायतो के खिलाफ राय बना लेते है ..... इनका राजनितिक उपयोग तो होता है आपने सही कहा और राजनितिक ढाल का प्रयोग ये पंचायते भी करती है.... पर जरुरत ये है की पंचायतो में कुछ सुधार किये जाये .. क्योकि उनका महत्व बहुत अधिक है हमारी सोच से ज्यादा .... मेरा उद्देश्य आपकी बात का विरोध नहीं था क्योकि मै स्वयं उनसे सहमत हु 100% लेकिन के एक और पहलु को जोड़ना था .... आपके लेख को पढ़कर बहुत अच्छा लगा आप ऐसे मुद्दे उठती रहेंगी............ शुभकामनाये......

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एक बात समझ नही आती की क्यों यह पंचायत वाले सिर्फ अपने फरमानों की वजह से सुर्खियों में आते है क्या इन्होंने धर्म और समाज का ठेका ले रखा है, बिहार और उप्र में तो मानों यह ही कोर्ट और जज है जब चाहे किसी की आबूरु से खेल सकते है जब चाहे किसी प्रेमी जोडे को मार सकते है यहां तक कि आर्नर किलिंग के ज्यादातार मामले इनकी वजह से ही होते हैं फिर भी सरकार है कि इन पर कोई कार्यवाही करने के इनकी तारीफदारी करती है. और इनके फैसले हमेशा प्रेम और विधवाओं के मामलों मॆं ठोस और सख्त क्यों होते है? शाय्द इसकी वजह से अधिकतर पचांयतों मॆं पंचों का अमिर होना . इनकी ओअहुच और रुतबे की वजह से कोई इनकी तरफ देख नही पाता कुछ कह नही पाता. क्या राजीव गांधी ने इसी ग्राम पंचायती राज का सपना देखा था, अगर हां तो सारा दोष उनका ही हैं

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विडम्बना तो ये ही कि जागरुक मानस विलुप्त प्राणी हो गए लगते है ,जो काम निरंतरता मैं किये जाने चाहिए वे symbolic किये जाते है, श्री श्री यदि हुक्म दे दे तो भक्त दिन प्रति दिन ऐसा करे पर सोनी जी ऐसा नहीं होगा कियोंकि ये न्यूज़ मैं आते रहने के तरीके हैं, असली enviromentalist सुंदर लाल बहुगुणा कि तरह पेड़ों पर ता उम्र चिपके रहे पर समाज क्या उनके message को समझ पाई आज तमाशे बहुत हैं असल काम कम है कितने लोग जानते हैं बाबा आमटे के असली काम को जो पूरी जिंदगी नाम कर गए मानवता उत्थान के लिए, आज के सेलेब्रिटी यदि दस मिनट को थाल्लेसिमिया के बच्चों को गोद मैं उठा लें तो न्यूज़ मिडिया और समाज सब आकर्षित हो जाते है उन डॉक्टर कार्यकर्ताओं का क्या जो हर समय उनकी देखभाल करते हैं असली काम का मोल नहीं बस हंगामे से मतलब हैं ,आप अपने सकारात्मक सोच का अलख जगाये रखें काली रातों के छोर पर सुना है उजाले होते हैं.

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सोनी जी, आरक्षण किसी भी समाज के लिए हमेशा नकारात्मक होता है. किसी भी स्त्री-पुरुष को बिना संघर्ष की योग्यता के उसे इस बैसाखी से उपकृत करना ना सिर्फ योग्यता के सिद्धांत का मजाक है बल्कि स्वयं उनके भीतर की संघर्ष की जिजीविषा को ख़त्म करना है. आरक्षण रूपी भीख कोई हक़ से नहीं मांग सकता. लेकिन वक्त के साथ इस भीख के विकराल होते स्वरूप को देखकर बहुत से लोग इसकी मांग हक़ के रूप में करने लगते हैं. तब एक नए तरह का अनर्थ पैदा होने की गुंजाइश हो जाती है. समाज के ऐसे अंग जो यह दावा करते हैं कि उन्हें ऐतिहासिक कारणों की वजह से आरक्षण अधिकार के रूप में मिलना चाहिए उन्हें अपने मांग पर विचार करना होगा कि इस तरह की हरकतों से वे क्या अन्यों(योग्य) के अधिकार का हनन नहीं करेंगे. रही बात महिलाओं की तो हमारे समाज में एक प्रकार का संतुलन स्थापित किया गया है जिसके तहत उन्हें भी बराबर का हक़ प्राप्त है. कुछ नालायकों की वजह से जरूर वे अत्याचार की शिकार होती रही हैं. लेकिन बहुसंख्यक समाज ऐसे दुष्ट कृत्यों को खारिज करता रहा है. हमारी माँ और बहनों को अनेकानेक मामलों में पूर्ण निर्णय का हक़ है और आज भी लोग उन्हें पूर्ण सम्मान देने की कोशिश करते हैं. हमारे परिवार सिस्टम पर मंडरा रहे खतरे को यों ही आँख बंद कर नहीं देखना चाहिए बल्कि भावी परिणामों के प्रति सतर्क नजर रखनी होगी. बार-बार यह कि पुरुष महिला वर्ग का विरोधी है या उसके प्रगति में रोड़े अटकाता है किस सीमा तक सही होगा? मेरा मानना है कि दोनों वर्ग विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं और इस पूरकता को समाप्त करने का हक़ किसी को नहीं मिलना चाहिए. सुधार के नाम पर किए जाने वाले कुछ काम भविष्य में खतरनाक साबित हो जाते हैं और सतत रूप से प्रवाहमान व्यवस्था को आघात पहुंचाते हैं. इसीलिए निर्णय के पूर्व इस तथ्य पर विचार अत्यावश्यक है.

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